सवाल वही था,अब कौन है ?

दिव्यांश श्रीवास्तव 

जयप्रकाश नारायण के जयन्ती पर प्रकाश डालते हुए बताया कि महात्मा गांधी के विचार की कई धाराएं चली और आज तक चल रही हैं उसी में से एक अहम धारा चली समाजवाद की, आचार्य नरेंद्र देव,डॉ लोहिया,जे.पी,अनगिनत नाम हैं । जे पी अपनी जवानी के दिनों में ही खुद में अंतरराष्ट्रीय बन चुके थे,वे अंतरराष्ट्रीय समाजवादी आंदोलन के नेता के रूप में स्थापित हो गए थे लेकिन समाजवादी आंदोलन से विलग होकर जब भूटान आंदोलन से जुड़ कर खुद को समेट लिया तो अतीत के माने जाने लगे वर्तमान धुंधला लगने लगा, विशेषकर जो नई पीढ़ी सामने आई थी,उसी क्रम में जे पी बहुत सरल और तरल थे, निहायत संवेदनशील,करुणा से भरे हुए उनका सबसे छोटा बयान जो निहायत ही मकबूल हुआ और याद करते ही मन गमगीन हो जाता है । वह है इनके अपने सहयोगी डॉ लोहिया की मृत्यु पर दिया गया इनका शोक संदेश।
दिल्ली विद्युत शवदाह गृह के लान में हुए शोक सभा मे अपार जन समूह के सामने जे पी ने केवल एक शब्द बोल पाए – राममनोहर हमसे दो साल छोटा था,और रोते रहे ।यह वाक्य मात्र संवेदना नही थी जे पी के दिल पर चोट थी जे पी को झकझोर कर खड़ा कर रही थी एक बड़ा सवाल सामने था – अब बचा कौन है जे पी ? महात्मा गांधी की चिता जब धधक कर जली और ज्वाला निकली तो जे पी अपने को रोक नही पाए थे । फूट फूट कर रो रहे थे, उस समय एक सवाल पूछ रहे थे – अब हम किसके पास जांयगे ? तब डॉ लोहिया का कंधा था जिस पर जे पी का सिर था आज उसी राममनोहर को जे पी विदा कर रहे थे सवाल वही था,अब कौन है?आखिरी पायदान पर बैठे इंसान की दिक्कत को कौन पढ़ेगा?उस दिन एक नया जे पी पैदा हुआ और इतिहास का वह हिस्सा बना जिस पर हम नाज करते हैं।

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